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परिचय
मन पखेरू
मैं हूँ जमीन बंजर, मुझे क्या कोई परवाह, घटा छाए तो क्या, धूप आये तो क्या ?श्रेणी
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Nishant on किस्मत Rahul Sharma on सूजन मेरे ‘पैरों’… suneeta on कहो किन ‘सपनों’ से… राजेश 'आर्य' on कहो किन ‘सपनों’ से… pratima dwivedi on कुछ मेरे बारे में -
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Category Archives: रिश्ते
क्यों ?
अब पलकें भीगती नहीं, किसी अपने के दूर जाने पर | अपना दायरा बढ़ा है, या कि अपने जज्बात सिमटे हैं ? – राजेश ‘आर्य’
विसर्जन
मुझे आज भी याद है अच्छी तरहबालकोनी पर खड़ा मैंअपनी माँ का आँचल पकड़ेऔर निचे सड़क परएक लम्बी सी रेंगती कतारजोर-२ से चिल्लाते हुए -“नमो नमस्ते, जगदम्बे भसते”और पीछे माँ दुर्गे की विलक्षण प्रतिमादस कन्धों पर विराजमान | माँ ने … Continue reading
मैं स्वप्न बुनता हूँ
कलेजे के तवे पर रखकर, मैं अरमानों को भुनता हूँ । मैं स्वप्न बुनता हूँ । कभी यूँ ही अकेले में बैठे-बैठे, एक झपकी सी आ जाती है, मैं गोद में सर रखकर सो जाता हूँ, माँ बालों को सहलाती … Continue reading
केंचुली
केंचुली देखी है कभी, कभी महसूस किया है उसके दर्द को । वो जब सर्प के आगोश में, लिपटी हुई तन पर, कुदती मचलती साथ उसके, इतराती है अपने भाग्य पर । और फ़िर एक दिन अचानक, सर्प निकल … Continue reading
कुछ होली पर……….
माँ की सुन-सुन प्यारी बोली, संग बैठ पूरी बेलने, बचपन की वो मेरी हमजोली, उसपे रंग उड़ेलने, दिल में बसी वो सूरत-भोली, उसको जी-भर छेड़ने, चली है मेरे यादों की टोली, आज होली खेलने |
प्रायश्चित् (रक्षा – बंधन पर विशेष)
मुझे अब भी याद है, वो दिन, जब मैं गया था पहली बार, तुम्हारे घर | हाँ वो तुम्हारा घर, जो समाज के नियमों ने बनवाये थे, ‘तुम्हारे’ लिये, ‘हमारे’ घर से अलग करके | मुझे घेरे खड़े थे, मेरे … Continue reading
मातृ दिवस पर….
मुश्किलें तो आएँगी, ख्वाब तो टूटेंगे । किस्मत तो रूठेगी, धैर्य तो छूटेगा । जब लक्ष्य अचानक छूट जाएगा, हाथों तक आते-आते । जब आँसू भी छोड़ना चाहेंगे, साथ आँखों का । जब सांत्वना भरे शब्द, तब्दील हो जाएँगे, फ़ब्तियों में । जब कोई … Continue reading
Posted in प्रेरणा-संकल्प, रिश्ते
Tagged आर्य, कविता, ख्वाब, प्रेरणा, भाव, माँ, राजेश, संकल्प, Hindi, Inspiration, Link, Mothers Day, Poem, Poetry
8s टिप्पणियाँ
मित्रता दिवस पर / अनकही
दोस्त , आज कहो ना कुछ अनकही । माना, इतनी परिपक्वता मुझमें नहीं कि समझ सकूँ , तुम्हारा हर भाव । इतनी विशालता मुझमें नहीं कि समा सकूँ, तुम्हारा हर दर्द । इतनी व्यापकता मुझमें नहीं कि अपना सकूँ, तुम्हारी हर सोच … Continue reading
सपना
बचपन में सिखाया था नानी ने, दोनों हाथों की अंगुलियों के बीच धागे को फँसाकर खटिया बुनना । सोचता था, उस वक्त जब बड़ा होऊँगा तो बड़ी होंगी अंगुलियाँ भी । फिर बनाऊँगा एक बड़ी-सी खाट और उसपर किसी ‘अपने’ को … Continue reading
