Category Archives: प्रेरणा-संकल्प

क्या कहें

क्या कहें कि तुम्हारा एहसास नहीं हो पाता जब तक कि सामने ना आ जाओ याकि एहसास करना नहीं चाहता क्योंकि साहस नहीं तुम्हारी बताई राह पर चलने का क्या कहें कि मैं भूल गया हूँ कि मैं कौन हूँ … Continue reading

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पुनः एक ‘दीवाली’

था राज तमस का चहुँ ओर, ना थी दिखने को कोई भोर | कुछ आत्मदीप फिर आ मिले, मन भयरहित हुआ, जब संग मिले | मिलकर दमके फिर वो एक साथ, और ‘प्रकाश’ ने विजय पा ली थी | वो … Continue reading

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बता तुझको हुआ क्या है ?

ए अमरवीर , ए भरतपुत्र बता तुझको हुआ क्या है ? परिस्थितियों का दास बनकर, खो दिया उल्लास तुमने, अपने बाजुओं की ताकतों का क्या किया कभी आभास तुमने ? मत रो कि तुम वीरपुत्र हो, उठ खड़े हो – … Continue reading

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नया साल

आओ नया साल कुछ इस तरह से मनाएँ, किसी उदास चेहरे को हंसा कर दिखाएँ | दादी गिर पड़ी है , आँखों में रोशनी नहीं है, चलो कुछ समय निकालकर, उन्हें चश्मा दिला लाएँ | सूज चुकी है बूढ़े पिता … Continue reading

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कड़ी

कड़ी जो जोड़ती है- कर्तव्य को अधिकार से, वाणी को व्यवहार से, सादगी को श्रृंगार से, नफ़रत को प्यार से । कड़ी जो जोड़ती है – अमीर को फ़कीर से, आत्मा को शरीर से, प्रसन्नता को पीर से, जोशीलेपन को … Continue reading

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वो खोमचे वाला

आज तीसवाँ दिन है, जब मैं लौट रहा हूँ औफ़िस से और मेरी निगाहें लगातार ढूँढ रही हैं, उस खोमचे वाले को, जो रोजाना लगाया करता था-गोलगप्पे, अपने उस छोटे से ठेले पर, और मेरे कदम अचानक मुड जाते थे … Continue reading

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मातृ दिवस पर….

मुश्किलें तो आएँगी, ख्वाब तो टूटेंगे । किस्मत तो रूठेगी, धैर्य तो छूटेगा । जब लक्ष्य अचानक छूट जाएगा, हाथों तक आते-आते । जब आँसू भी छोड़ना चाहेंगे, साथ आँखों का  । जब सांत्वना भरे शब्द, तब्दील हो जाएँगे, फ़ब्तियों में  । जब कोई … Continue reading

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आह्‌वान

युवा, जिसका चिंतन कभी वृद्ध नहीं हुआ । जिसे विश्वास है अपने-आप पर । जिसमें उमंग है, साहस है, जोश है, कुछ कर-गुजरने का । जो सक्षम है, हवाओं का रूख मोड़ने में । युवा, जिसे भय नहीं, कितना भी … Continue reading

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मेरी कविताओं के खातिर…..

कभी इतना रोओ, कि हँसी खिल जाए । कभी इतना हँसो, कि कुछ आँसू छलक आए । कभी कहते रहो और होंठ भी ना हिलें, कभी चुप ही रहो और हम सुनते रहें । कभी इतना जियो कि जी थक जाए, … Continue reading

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चेतावनी

नि:शब्द गूँजती आवाजें । नि:शब्द, क्योंकि ये आवाजें आ रही हैं, उन गलों से, जिनकी वाणी से स्वर छीन लिया गया, क्योंकि ये अक्सर उठती थीं उन चिर-परिचित जीवित आकृतियों के खिलाफ जिनकी मूर्तियाँ लगाई जानी हैं, कल चौराहे पर । … Continue reading

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