समय चला और मैं भी उसके साथ-साथ ।अब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कहीं कुछ पीछे छुट गया है, लेकिन क्या? अपनी डायरी टटोलता हूँ, तो उसमें धुंधला-धुंधला सा दिखता है पंक्तियों में गूँथा मेरा अतीत ।उसी अतीत को कुछ खंगालकर बेहतर जीने की कोशिश है यह ब्लोग ।
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परिचय
मन पखेरू
मैं हूँ जमीन बंजर, मुझे क्या कोई परवाह, घटा छाए तो क्या, धूप आये तो क्या ?श्रेणी
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Nishant on किस्मत Rahul Sharma on सूजन मेरे ‘पैरों’… suneeta on कहो किन ‘सपनों’ से… राजेश 'आर्य' on कहो किन ‘सपनों’ से… pratima dwivedi on कुछ मेरे बारे में -
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kya likhu yaar
no words to explan my feelin after readin ur poems
bahut achha hai, aap ki lekhni sidhe bhavnao pe asar dalti hai.