बन गया है नासूर यह,
शिव यह पीड़ा अब नहीं |
तुम लो रतन, मैं पीयूं हलाहल, 
यह देव-दानव क्रीडा अब नहीं |
भयाक्रांत है हर जीव यहाँ,
आतंक से दिल फट रहा |
धोखा-धडी बस गया खून में,
विश्वास सबसे हट रहा |
सीखा बहुत इसने मरना – मारना,
बस जीने का आया अदब नहीं |
शिव यह पीड़ा अब नहीं |
सौदे यहाँ हर रिश्ते के,
हर शख्श खरीद दार है |
बिकता बेमोल इंसानियत
बस स्वार्थ की दरकार है |
था बाज़ार यहाँ तो सदियों से
पर बिकते यहाँ थे सब नहीं |
शिव यह पीड़ा अब नहीं |
रक्त- रंजित यहाँ धर्म है,
अधर्म की फिर बात क्या |
हैं हिन्दू, मुस्लिम, इसाई सभी,
मानवता की जात क्या |
भस्म कर दो सब यहाँ,
रहे खुदा, पर मजहब नहीं |
शिव यह पीड़ा अब नहीं |
है रेंगती लाशें सड़कों पर,
कुछ जीवन का लक्ष्य नहीं |
है क्या बचा इस धरती पर,
जिसका इन्सां यहाँ भक्ष्य नहीं |
अब समय आ गया तांडव का
बहलाओ दिखाके करतब नहीं |
शिव यह पीड़ा अब नहीं |
- राजेश ‘आर्य’
महाशिवरात्रि, ई. संवत – २०११

देवी प्रसाद मिश्र की कविता ‘प्रार्थना के शिल्प में नहीं’ याद हो आई…
इस लिंक पर उसका पोस्टर देखें…
http://ravikumarswarnkar.wordpress.com/2009/05/12