मैं और मेरा एकाकीपन,
सोच रहे हैं, कुछ मिलकर शायद
और मेरी अँगुलियाँ अनायास ही,
मेरी इन्द्रियों से मुक्त होकर,
कुछ उकेर रही हैं कागज पर ।
कुछ आकृति सी उभर रही है-
मानव सदृश ।
अरे ये तो मैं हूँ !
मैं कुछ मुस्कुराता हूँ,
अपनी तस्वीर को देखकर,
फ़िर अगले ही पल,
एक अजीब सी शिकन ।
ये क्या,
कभी उभरने की उमंग,
कभी सिमटने की घुटन ।
एक ही प्रवृति पर दोहरे एहसास क्यों ?
पता नहीं,
ये रेखाएँ मुझे बना रही हैं,
या मैं इन रेखाओं को ?
मैं एकाकीपन खोजता हूँ,
या एकाकीपन मुझे खोज लेती है ?
फ़िर अनायास ही कभी उभर आता हूँ मैं,
अपने-आप को सिमटता देखकर ।
व्याकुलता-
अपने-आप से भागने की,
फ़िर अगले ही पल व्यग्रता-
अपने-आप को पाने की,
शायद कोशिश,
अकेले जीने की,
अकेलेपन से भागकर ।
————”सर्जना” – २६ वें अंक में प्रकाशित————-
February 11, 2009 at 1:09 pm
अरे ये तो मैं हूँ ……बहुत अच्छी रचना
अनिल कान्त
मेरी कलम – मेरी अभिव्यक्ति
February 11, 2009 at 1:36 pm
bahut achhi lagi kavita
February 11, 2009 at 5:38 pm
अजब कशमकश….
लेकिन बहुत अच्छा….
February 11, 2009 at 8:25 pm
सुन्दर काव्य चित्रण
—
गुलाबी कोंपलें । चाँद, बादल और शाम
February 12, 2009 at 9:34 am
Good one !
March 25, 2009 at 6:58 am
आपका ब्लॉग अछा है और मुझे भी ब्लॉग सजना सीख़सो