पुकार रही है माँ तुम्हें,
‘बोस‘ तुम कहाँ हो ?
हम दे रहे खून अपना,
कश्मीर में, कभी ताज में |
पर दिखती नहीं आज़ादी,
कहीं किसी अंदाज में |
उठ रहा विश्वास तेरे वादे से,
और तुम खो गये ,
जाने कहाँ हो?
अब आ जाओ सामने भी,
यदि छुपे हो किसी वन् में,
नहीं तो लो नया जन्म,
फिर किसी मानव तन में |
और दहाड़ो कि माँ खुश हो जाए,
मेरे पुत्र तुम यहाँ हो |
‘बोस‘ तुम कहाँ हो ?
- नेता जी के जन्मदिन पर
January 23, 2009 at 10:43 am
बहुत खूब
January 23, 2009 at 10:44 am
अब आ जाओ सामने भी,
यदि छुपे हो किसी वन् में,
नहीं तो लो नया जन्म,
फिर किसी मानव तन में |
और दहाड़ो कि माँ खुश हो जाए,
मेरे पुत्र तुम यहाँ हो |
‘बोस‘ तुम कहाँ हो ?
सुभाष तो रहस्य थे। और रहस्य पर कभी किसी का कब्जा नहीं होता। शायद कभी प्रकट भी हो जाँए। सुन्दर प्रस्तुति।
January 23, 2009 at 11:20 am
nice one
January 23, 2009 at 12:36 pm
नेता जी के जन्मदिन पर-एक बेहतरीन रचना.
January 23, 2009 at 2:22 pm
बहुत सुंदर…।
January 23, 2009 at 2:44 pm
a good one:)