पुकार रही है माँ तुम्हें,
‘बोसतुम कहाँ हो ?

हम दे रहे खून अपना,
कश्मीर में, कभी ताज में |
पर दिखती नहीं आज़ादी,
कहीं किसी अंदाज में |
उठ रहा विश्वास तेरे वादे से,
और तुम खो गये ,
जाने कहाँ हो?

अब जाओ सामने भी,
यदि छुपे हो किसी वन् में,
नहीं तो लो नया जन्म,
फिर किसी मानव तन में |
और दहाड़ो कि माँ खुश हो जाए,
मेरे पुत्र तुम यहाँ हो |
बोसतुम कहाँ हो ?

- नेता जी के जन्मदिन पर