आओ नया साल कुछ इस तरह से मनाएँ,
किसी उदास चेहरे को हंसा कर दिखाएँ |
दादी गिर पड़ी है , आँखों में रोशनी नहीं है,
चलो कुछ समय निकालकर, उन्हें चश्मा दिला लाएँ |
सूज चुकी है बूढ़े पिता की आँखें, बेटे के आने के इंतजार में,
चलो कुछ समय को, उनके बेटे हम बन जाएँ |
सड़क किनारे वो अम्मा, कितनी देर से खड़ी हैं,
चलो उसकी हथेली पकड़कर, उस पार हम कराएँ |
खामोश हो गई है बहना, घर की परिस्थितियाँ समझकर,
चलो अपने कंधे मिलाकर, उनकी डोली हम उठवाएँ |
भाई मायूस हो गया है, अपने सपनों को देखकर बिखरते,
चलो संग बैठें उसके, उसकी आँखों में नये सपने हम सजाएँ |
खो चुके हैं जो बहुत कुछ, नियति के कहर में,
चलो ऐसे लोगों की दुनियाँ, फिर से हम बसाएँ |
कुछ देर के लिए, भूलें हम खुद को,
कुछ देर के लिए, हम सबके हो जाएँ |
बाँटें छोटी-छोटी खुशियाँ, छोटे-छोटे गम बँटाएँ,
आओ नया साल कुछ इस तरह से मनाएँ |
-नववर्ष के शुभकामनाओं सहित, राजेश रंजन ‘आर्य‘
December 31, 2008 at 1:17 pm
kya baat hain ….a excellent and real essence full description to celebrate new year …a real conscienceful endeavour in this composition …. thanks …Raj bhai
December 31, 2008 at 10:01 pm
Really cool poem bhaiya…..n its a great tool to express our feelings nice to read d same…..keep up