आज तीसवाँ दिन है,
जब मैं लौट रहा हूँ
औफ़िस से
और मेरी निगाहें लगातार ढूँढ रही हैं,
उस खोमचे वाले को,
जो रोजाना लगाया करता था-गोलगप्पे,
अपने उस छोटे से ठेले पर,
और मेरे कदम अचानक मुड जाते थे उस और,
पापा के सभी सलाहों को नजर-अंदाज़ कर ।
तो क्या सचमुच चला गया वो,
हमेशा के लिये इस शहर को छोड़कर ?
वो शहर जिसे अभिमान है,
अपने अमीरीपन पे |
वो शहर जिसे पसंद नहीं,
किसी गरीब, लाचार को पनाह देना ।
कल तक वो शहर मजबूर था,
अपने संरक्षक राष्ट्र के नाम पर,
लेकिन अब क्यों??
अब वो बड़ा हो गया है,
अब उसकी अपनी जरुरतें हैं,
जो मेल नहीं खाती राष्ट्र की जरुरतों से ।
दोष किसका है,
मालूम नहीं,
मालूम है तो बस कि,
वो खोमचे वाला भुगत रहा है,
किसी अनजान पाप कि सज़ा ।
अनजान पाप-
शायद भारतीय होने का पाप ।
पाप ही तो है उसके लिये,
भारतीय होना इतना आसान भी नहीं ।
उसे जाननी होती है कई सारी भाषाएँ,
उसे रुबरू होना होता है,
कई धर्म, कई वेश-भूषा, कई रूपों से ।
और फ़िर उसे जीना होता है इस दंभ के साथ,
कि हम सब एक हैं,
हमारी संस्कृति एक है,
हमारा देश एक है।
और फ़िर एक दिन अचानक,
उसकी थोड़ी-सी उदासीनता,
अल्प-ज्ञान अथवा अल्प-जागरुकता,
चूर-चूर कर देती है उसका यह दंभ,
जो उसने बड़ी मुश्किल से प्रतिस्थापित किया था,
अपने तमाम विरोधी विचारों से लड़-झगड़ कर |
खैर, अब तो जिह्वा भी भूलने लगी है,
इस गोलगप्पे का स्वाद |
और मैं जल्द ही सीखने लगा हूँ,
अपने स्वाद को भूलकर,
सिर्फ़ खाने के लिये खाना ।
जैसे उस खोमचे वाले ने भी सीख लिया होगा,
सपरिवार,
अपनी भूख को भूलकर,
सिर्फ़ जीने के लिये जीना ।
August 7, 2008 at 9:21 am
its a very good poem , a poem which speeks the very sensitive condition ….of any place either in India or some sensitive places outside india ….when people are not aware of the situation ..and suddenly they were in trouble ..what is the soultion of these all ” marmik” conditions …….can we do some thing for these situation?? …
yes we can do !!!…..” some great people had said that ” prevention is better than cure ….so start prevent the cause of these situations ….either it may be a little start……***
September 12, 2008 at 8:50 am
Achchha laga, Kavita kanhi gahrai ko chhukar nikal gaya aur hum sochate rah gaye.
I like verymuch.