नि:शब्द गूँजती आवाजें ।

नि:शब्द, क्योंकि ये आवाजें आ रही हैं,

उन गलों से,

जिनकी वाणी से स्वर छीन लिया गया,

क्योंकि ये अक्सर उठती थीं

उन चिर-परिचित जीवित आकृतियों के खिलाफ

जिनकी मूर्तियाँ लगाई जानी हैं,

कल चौराहे पर ।

उन्हें मूक बना दिया गया,

सदा के लिये ।

पर, कौन जाने

जब ये जीवित आकृतियाँ तब्दील हो जाएँगी,

मूक, बेजान मूर्तियों में

फिर भी ये नि:शब्द आवाजें होंगी

और उस वक्त यही नि:शब्द आवाजें

उन्ही मूर्तियों से परावर्तित होकर,

फ़िर से अपने स्वर वापस लेंगी

और चीख-चीख कर कहेंगी

उन मूर्तियों की ओर इशारा कर,

कि मेरे स्वर सिर्फ़ मेरे  स्वर नहीं,

ये मेरे प्राण हैं, मेरे सिद्धांत हैं

जो मरणशील नहीं, तुम्हारी तरह ।

ये तो प्रवाह हैं,

जो हर युग, हर काल में

सतत बहते रहते हैं,

किसी-ना-किसी की मानसिकता में ।

दमन तुम स्वर का तो कर लोगे,

परन्तु प्राण तो फ़िर भी रहेंगे ही ।

और जैसे ही इसे स्वर मिला,

यह पुन: चिल्ला उठेंगी,

तुम्हारे अन्याय के खिलाफ ।