Posted by: राजेश रंजन | February 3, 2007

माँ एक बार मरने दे मुझे

आज पहली बार ऐसा हुआ,

जब मेरे जन्मदिन पे खुशियाँ नहीं मनायीं गयीं ।

कोई मेरे घर नहीं आया

मुझे जन्मदिन पे बधाई देने।

बाहर निकला

तो सड़क बिल्कुल शांत, सुनसान,

मानो कोई जीता ही नहीं यहाँ ।

मैना भी तो नहीं आई आज,

मेरे आंगन दाना चुगने ।

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मेरी आँखों में आँसू आ गये,

रोते हुए माँ से पूछा -

“माँ, मैंने क्या किया है ?

मेरे जन्मदिन पर सब उदास क्यों हैं ?”

माँ ने झट मुझे गले से लगा लिया,

फ़िर रुँघते हुए बोली -

“मेरे लाल, तेरी किस्मत ही फ़ूटी थी,

जो तू ११ तारीख को पैदा हुआ ।

जिस रोज तू पैदा हुआ,

उसी रोज ‘अमेरिका’ में तीन धमाके हुए ।

और तब से हर एक साल,

किसी-न-किसी महीने, उसी ११ को

कभी मैड्रिड, तो कभी मुम्बई में*

धमाके होते ही रहते हैं ।

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अब तो लोगों ने भी निकलना छोड़ दिया है,

इस तारीख को ।

स्कूलों में छुट्टियाँ कर दी जाती हैं,

ऑफ़िस बन्द रहते हैं,

यातायात ठप्प रहते हैं,

पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी सहमे रहते हैं,

चुप-चाप, निर्जीव से

ताकि उन्हें कोई फ़िर से मारने ना आए,

पहले से ही मरा समझकर ।

अब तू ही बता बेटे-

कौन आएगा तेरे संग,

तेरे जन्मदिन की खुशियाँ बाँटने ।”

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मैंने कुछ नहीं कहा,

चुप-चाप आँसू पोंछकर सर छुपा लिया,

माँ के आँचल में ।

मन अचानक से बड़ा हो गया था,

मानो कोई प्रतिध्वनि गूँज रही थी अन्दर-

कि तू, तेरा जन्म ही जिम्मेवार है,

इस खौफ़, आतंक और तबाही के लिये ।

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और तब से मैं सहमा-सा रहता हूँ ।

हर साल, हर माह की वो तारीख

मुझे कचोटती है, मुझे रुलाती है ।

और जब कोई एक-भी प्राणी मरता है,

इस रोज आतंक से,

तो लगता है,

मैं मर रहा हूँ बार-बार ।

—————————————

माँ, बस एक बार मरने दे मुझे,

मैं वादा करता हूँ-

मैं फ़िर जन्म लूँगा, तुम्हारी ही कोख से,

बस इतना ध्यान रखना माँ,

कि वो तारीख ११ की नहीं हो ।

*११ सित० - न्यूयार्क

११ मार्च ०४ - मैड्रिड

११ जुलाई ०६ - मुम्बई

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Responses

पहली बार मैं आपके ब्लाग पर आ रहा हूँ…बहुत अच्छा लगा मुझे कि इतने पाक भावनात्मक संवेदना के होते हुए भी हम क्यों जल रहें हैं…बहुत ही सुंदर रचना के द्वारा अपने संकेत को पूर्णत: स्पष्ट किया है…बधाई स्वीकारें…।

आपकी रचना भीतर तक छू गई.. शब्दो में संवेदनाओं और कुछ ना कर पाने कि तङप का अद्भूत संगम है.. लफ़्ज़ बोल पङे हैं..

bahut sundar aapki rachnaon ka intezar rahega

सुन्दर कविता। सुन्दर भाव।

बहुत सुंदर एवं भावुक कविता …बधाई !!

बहुत ही सुन्दरता से आपने भावों को शब्दों में पिरोया है, बधाई स्वीकार करें!!!

बहुत सुन्दर कविता,साधूवाद

आज तो तीन तारीख़ है…

Rajesh Ji!! You touched our heart!! really its wonderful!!

आप की इस कविता ने तो ह्रदय को झकझोर दिया है। बहुत अच्छे राजेश जी ।

Excellent!

very nice and touching poem . I am deeply effected by this. try to write some poem that could awake youth about todays problem and encourage them to do something.

Itni samvedna,itna dard aur kavyashilpa…….
aajkal milna mushkil hai.

Bhav ko shabd to mile , bhavon ko samsya ka abhas hua,
Kintu dukh is bat ka hai ki samadhan fir atank ko chod raha hai.
kya mar kar dusare tarikh par janm le kar 11 ko kalankit chod kar
hum yug dharm kar rahe hain ?

Kyu na ho aisa ki 11 ko janm lekar kuch aisa kar jaye ki
har marne wala 11 ko janm lena chahe ..

Khun mei ho woh jwala humare jo is kalak ko mita sake …

With Love
Swati Di

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