आज पहली बार ऐसा हुआ,

जब मेरे जन्मदिन पे खुशियाँ नहीं मनायीं गयीं ।

कोई मेरे घर नहीं आया

मुझे जन्मदिन पे बधाई देने।

बाहर निकला

तो सड़क बिल्कुल शांत, सुनसान,

मानो कोई जीता ही नहीं यहाँ ।

मैना भी तो नहीं आई आज,

मेरे आंगन दाना चुगने ।

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मेरी आँखों में आँसू आ गये,

रोते हुए माँ से पूछा -

“माँ, मैंने क्या किया है ?

मेरे जन्मदिन पर सब उदास क्यों हैं ?”

माँ ने झट मुझे गले से लगा लिया,

फ़िर रुँघते हुए बोली -

“मेरे लाल, तेरी किस्मत ही फ़ूटी थी,

जो तू ११ तारीख को पैदा हुआ ।

जिस रोज तू पैदा हुआ,

उसी रोज ‘अमेरिका’ में तीन धमाके हुए ।

और तब से हर एक साल,

किसी-न-किसी महीने, उसी ११ को

कभी मैड्रिड, तो कभी मुम्बई में*

धमाके होते ही रहते हैं ।

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अब तो लोगों ने भी निकलना छोड़ दिया है,

इस तारीख को ।

स्कूलों में छुट्टियाँ कर दी जाती हैं,

ऑफ़िस बन्द रहते हैं,

यातायात ठप्प रहते हैं,

पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी सहमे रहते हैं,

चुप-चाप, निर्जीव से

ताकि उन्हें कोई फ़िर से मारने ना आए,

पहले से ही मरा समझकर ।

अब तू ही बता बेटे-

कौन आएगा तेरे संग,

तेरे जन्मदिन की खुशियाँ बाँटने ।”

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मैंने कुछ नहीं कहा,

चुप-चाप आँसू पोंछकर सर छुपा लिया,

माँ के आँचल में ।

मन अचानक से बड़ा हो गया था,

मानो कोई प्रतिध्वनि गूँज रही थी अन्दर-

कि तू, तेरा जन्म ही जिम्मेवार है,

इस खौफ़, आतंक और तबाही के लिये ।

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और तब से मैं सहमा-सा रहता हूँ ।

हर साल, हर माह की वो तारीख

मुझे कचोटती है, मुझे रुलाती है ।

और जब कोई एक-भी प्राणी मरता है,

इस रोज आतंक से,

तो लगता है,

मैं मर रहा हूँ बार-बार ।

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माँ, बस एक बार मरने दे मुझे,

मैं वादा करता हूँ-

मैं फ़िर जन्म लूँगा, तुम्हारी ही कोख से,

बस इतना ध्यान रखना माँ,

कि वो तारीख ११ की नहीं हो ।

*११ सित० – न्यूयार्क

११ मार्च ०४ – मैड्रिड

११ जुलाई ०६ – मुम्बई

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