Posted by: राजेश रंजन | December 27, 2006

ज़िन्दगी

जब तक जिया मैं,

जिया ऐशो-आराम से ।

मैं लूटता रहा गरीबों को,

चूसता रहा लाचारों को,

ताकि भर सके मेरी तिज़ोरी ।

मैं जलता रहा औरों की तरक्की पर,

और करता रहा जोड़-तोड़ ,

ताकि निकल सकूँ सबसे आगे ।

मैंने कभी देखा नहीं,

किसी नारी को पवित्र दृष्टि से ।

और जब भी मौका मिला ,

इस्तेमाल किया उन्हें,

अपने ताकत-दौलत के बल पर,

अपनी वासना की आग बुझाने को ।

हाँ, मैंने वो सब कुछ हासिल किया,

जो मैंने चाहा- ‘सही या गलत’ ।

ज़िन्दगी आराम से कट रही थी,

कि अचानक एक रोज,

मार दिया गया मुझे,

धर्म-सम्प्रदाय के दंगों में ।

अब सोचता हूँ मैं मरा-मरा -

कि क्यों व्यर्थ झगड़ता रहा मैं ईश्वर से

मानव-जन्म के लिए ?

जब ऐसे ही जीनी थी ज़िन्दगी,

तो क्यों-ना पैदा हुआ मैं,

कुत्ते के रूप में ?

यों कम-से-कम मैं बैमोत मरता तो नहीं,

इस धर्म-सम्प्रदाय के झगड़े में ।

यों कम-से-कम ज़िन्दगी लम्बी तो होती ।

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Responses

sahi hi kaha hai
“jahan na punchy kavi vahan pahunchy kavi..”

really nice to see this type of composition..

keep the passion on..

this is marvellous
bhai,
why did you stop writing ?
nothing appeared in Jan 07 ?
please write atleast one in a month.
regards

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