Posted by: राजेश रंजन | October 18, 2006

देश तेरे लिए

इतिहास के पन्ने उलटते वक्त,

कभी- कभी सोचता हूँ

कि कैसे-कैसे,

उन लूटेरों ने, अँग्रेजों ने

लूटा होगा , छलनी किया होगा

हमारे देश की जनता को,

हमारी संस्कृति को , सभ्यता को ,

हमारी धरोहर को ।

मन में अजीब से चित्र घुमने लगते हैं ।

मन-ही-मन उन्हें गालियाँ देता हूँ

और फिर सो जाता हूँ,

चैन की नींद ,

कि चलो अब तो हम आजाद हैं ।

—————————-

और अगली ही सुबह,

अखबार में देखता हूँ -

आतंक के साये में डर-डर के जीते लोग,

भ्रष्ट नेताओं की चाल में बलि चढती भोली-भाली जनता,

आधे पेट खाकर जीवन-यापन करता परिवार,

अपनी ही हालत पे रोते सरकारी दफ़्तर, अस्पताल

और ना जाने कितने समस्याओं से जूझता अपना राष्ट्र ।

मन में फिर सवाल उठता है ,

क्या हम सचमुच आजाद हैं ?

फिर मुँह से भद्दी गालियाँ निकलती हैं ,

उन भ्रष्ट नेताओं के लिये , आतंकवादियों के लिये ।

—————————-

पर क्यों , किसलिए ?

मैं क्यों उनसे इतनी घृणा करता हूँ ?

उनने जो कुछ भी किया ,

अपने स्वार्थवश अथवा अज्ञानवश |

पर मैनें क्या किया

अपने देश के लिए ?

कहीं मैं भी तो जिम्मेवार नहीं ,

इन सब के लिए ?

फिर से वही प्रश्न

और मैं उलझ पड़ता हूँ, अपने-आप से ।

—————————-

मुझे कोई अधिकार नहीं ,

किसी से घृणा करने का।

मुझे घृणा है ,

तो अपने आप से , अपनी मूकदर्शिता से , अपनी अकर्मण्यता से

अपनी उस खुद की बनाई हुई मजबूरी से ,

जो मुझे कुछ करने नहीं देता,

अपने स्व से उठकर ।

उस मोह से , उस बंधन से ,

जो मुझे सीमित करता है ,

अपने-आप तक , अपने परिवार तक ।

—————————-

लेकिन फिर, अगर ये ही मेरा पूरा सच है ,

तो मन में इतनी उथल-पुथल क्यों ?

इतनी घुटन क्यों?ये उबाल क्यों ?

संभवतः ये संकेत हैं ,

कि मेरा भावनाएँ अभी मरी नहीं ,

सुसुप्त भले ही हैं ।

मानो जागने के लिए इंतजार हो,

किसी क्षण-विशेष का ।

जब ये सीमाएँ टूटेंगी ,

जब कोई मोह नहीं , कोई बंधन नहीं

बस एक जूनून ,

कि मिटा दूँगा हर उस छोटी - बड़ी शक्ति को,

जो छीनती है हमसे  हमारी आजादी , हमारा चैन ।

—————————-

इसलिए ,

हे देश के भ्रष्ट-स्वार्थी नेताओं ,

हमारी अमन-शांति छीनने वाले आतंकवादियों ,

और हमारी तरक्की से जलने वाले राष्ट्रों

चेतो ।

हमारे भीतर की उबाल को

कम मत आँको ।

क्योंकि इनमें इतनी ऊर्जा है ,

कि ये सुनामी बनकर ,

महलों को भी मिट्टी में परिणत कर  सकती है ।

Responses

राजेशजी मनोमंथन को उजागर करती एक धड़कती कविता लिखी हैं आपने. सच में सारे जहाँ को गालियाँ दॆने से पहले हमें सोचना होगा हमने क्या किया हैं अपने देश के लिए.

हमारे भीतर की उबाल को

कम मत आँको ।

क्योंकि इनमें इतनी ऊर्जा है ,

कि ये सुनामी बनकर ,

महलों को भी मिट्टी में परिणत कर सकती है ।

सही कहा, मगर जाने यह दिन कब आएगा???

सही लिखा आपने

बहुत बढिया लिखते हैं आप.

धन्यवाद

Really in our daily Home to office and office to Home rotine, we have lost ourselves…
Its a real eye-opener..

Leave a response

Your response:

Categories