Posted by: राजेश रंजन | October 18, 2006

दीवाली

वो एक दीया,

जिसने ललकारा है, अँधेरे को ।

वो एक दीया,

जिसने हिम्मत की है, तेज़ आँधियों से लड़ने की ।

वो एक दीया,

जो खुद जला है, औरों की रोशनी के लिए ।

वो एक दीया,

जो प्रेरणा-स्त्रोत है , हर मद्धिम पड़ रहे दीये के लिए ।

वो एक दीया,

जिसे ख्याल है, अपनी मर्यादा का ।

वो एक दीया,

जिसे विश्वास है, अपनी जीत पर ।

वो एक दीया,

जिसे गर्व है , अपनी संस्कृति पर ।

वो एक दीया,

जो कहीं-ना-कहीं बसा है, हर किसी के हृदय में ।

क्यों ना उन दीयों को साथ यूँ सजाएँ हम ,

ना अँधेरा रहे कहीं दूर-दूर तक

कुछ इस तरह से दीवाली मनाएँ हम ।

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जो कहीं-ना-कहीं बसा है, हर किसी के हृदय में ।

क्यों ना उन दीयों को साथ यूँ सजाएँ हम ,

ना अँधेरा रहे कहीं दूर-दूर तक

कुछ इस तरह से दीवाली मनाएँ हम ।

हम तो कब से बैठे है, आप ही देर से आए हैं
बाकि भी आऐंगे इस नेक कार्य में हाथ बंटाने
और किसी को हो ना हो
हमें तो हर ब्लॉगर पर पूरा विश्वास है :-)

आपको दिवाली की शुभकामनाएँ

दीपो की रौशनी से रौशन हो जग सारा,
इस काम को करने का कर्तव्‍य है हमारा।

आपको दीपावली पर्व की शुभ कामनाऐ

दीपो की रौशनी से रौशन हो जग सारा,
इस काम को करने का कर्तव्‍य हमारा है।

आपको दीपावली पर्व की शुभ कामनाऐ

राजेश जी.

आपकी ये सुंदर कविता पढ कर मन आनंदित हो गया और कई मित्रों को आपकी कविता भेज दी है. हां आपकी वैब साईट का लिंक भी दिया है ताकि उन्हें ये अचरज न हो कि मैं इतना सुंदर कैसे लिख पाया, और उन मित्रों में से भी कुछ आपकी वैब साईट पर आयें और आपके लेख पढ कर आनंद उठा सकें.

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