वो एक दीया,
जिसने ललकारा है, अँधेरे को ।
वो एक दीया,
जिसने हिम्मत की है, तेज़ आँधियों से लड़ने की ।
वो एक दीया,
जो खुद जला है, औरों की रोशनी के लिए ।
वो एक दीया,
जो प्रेरणा-स्त्रोत है , हर मद्धिम पड़ रहे दीये के लिए ।
वो एक दीया,
जिसे ख्याल है, अपनी मर्यादा का ।
वो एक दीया,
जिसे विश्वास है, अपनी जीत पर ।
वो एक दीया,
जिसे गर्व है , अपनी संस्कृति पर ।
वो एक दीया,
जो कहीं-ना-कहीं बसा है, हर किसी के हृदय में ।
क्यों ना उन दीयों को साथ यूँ सजाएँ हम ,
ना अँधेरा रहे कहीं दूर-दूर तक
कुछ इस तरह से दीवाली मनाएँ हम ।
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