दोस्त ,
आज कहो ना कुछ अनकही ।
माना, इतनी परिपक्वता मुझमें नहीं
कि समझ सकूँ ,
तुम्हारा हर भाव ।
इतनी विशालता मुझमें नहीं
कि समा सकूँ,
तुम्हारा हर दर्द ।
इतनी व्यापकता मुझमें नहीं
कि अपना सकूँ,
तुम्हारी हर सोच ।
इतनी प्रचूरता मुझमें नहीं
कि पूरी कर सकूँ,
तुम्हारी हर जरूरत ।
इतनी खुशी मुझमें नहीं
कि हँसा सकूँ,
तुम्हें दो पल ।
इतना ज्ञान मुझमें नहीं
कि सिखा सकूँ ,
तुम्हें चार बातें ।
इतनी प्यार मुझमें नहीं
कि भूला सकूँ,
तुम्हारी हर शिकायत ।
इतनी आकर्षण मुझमें नहीं
कि बाँध सकूँ
तुम्हें अपने पास ।
पर, तुम तो संकुचित नहीं,
सीमित नहीं,मेरी तरह ,
फिर दूर क्यों ?
आओ ना मेरे पास,
सपने में ही सही ।
बैठो मेरे करीब,
और कहो न कुछ अनकही ।