रात , एक नवयौवना

मेरे सपने में आई

ललसाई आँखों में मुरझाये स्वप्न लिये ।

बोली – ‘क्या अपने सपने में थोड़ा-सा स्थान दोगे ?

कुछ देर के लिये मुझे नारी की पहचान दोगे ?

मैं जीना चाहता हूँ चन्द-पल,

तेरे सपने में सही ।’

मैंने ध्यान से देखा उसे ,

थे सुघड़ बदन पर सफ़ेद वस्त्र

मैंने देखा नहीं था,

उसे कहीं अन्यत्र ।

पर जाने क्या सोचकर ,

मैंने उसे अनुमति दे दी

उसके सपनों को मेरे सपने ने सहमति दे दी ।

तभी सहसा एक चीख से , स्वप्न टूट गया

जो जहाँ जैसा था, वहीं छूट गया ।

मैंने बाहर जाकर देखा ,

वो चीख आ रही थी, उन्हीं नाजुक होठों से

वही ललसाई आँखें , वही मुरझाया चेहरा ।

वो पिट रही थी, समाज के ठेकेदारों से ।

दोष उसका बस इतना था ,

सपने बह रहे थे , उसके आँसूओं के कतारों से ।

वो चीख रही थी, न्याय के लिये ।

पर एक भी कदम ना बढ़े ,

 उस असहाय के लिये ।

वो अबला लगातार पिट रही थी,

विधवा होने की सजा में,

घुट रही थी , लुट रही थी ।

और मैं जो रात सपने में उसे खुश कर रहा था,

अब उसे पहचानने से भी मुकर रहा था ।

कितना फ़र्क होता है ना,

स्वप्न और यथार्थ में,

सोच और पुरुषार्थ में ।