सोऽहं (मैं वही हूँ) - मैं वही हूँ, जिसे नियन्ता ने सर्वश्रेष्ठ मानव योनि में भेज दिया। मेरे लिये उच्च मानवीय क्षमताएँ सहज-सुलभ हैं। मैं साधक हूँ, जिसे युग-ऋषि ने युग-तीर्थ में रहकर साधना करने का अवसर दिया। साधक का कोई क्रम मेरे लिये कठिन क्यों होगा ?
शिवोSहम् (मैं शिव रूप हूँ ) – शिव अर्थात कल्याणकारी | मैं मूलत: कल्याणकारी हूँ – मेरी भावनाओं, विचारणाओं, इच्छाओं, चेष्टाओं, अभ्यास आदि में अशिव का कोई स्थान कैसे हो सकता है ?
सच्चिदानंदोहम ( मैं सत चित आनंद रूप हूँ ) मैं असत से प्रभावित क्यों होऊं ? मैं जो शुभ नहीं, टिकाऊ नहीं उसे क्यों चाहूँ ? मैं आनंद हूँ , पदार्थों में खोजता हुआ क्यों भटकूँ ? मैं श्रेष्ठतम में ही रस क्यों ना पैदा कर लूँ ?
तत्वमसि ( वह तुम्ही हो ) जीवन में, संसार में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, वह तुम (परमात्मा ) ही तो हो | हर दृश्य आकाश ही तो है | फिर श्रेष्ठता खोजता क्यों भटकूँ, पदार्थ की गुलामी क्यों करूँ | सारी श्रेष्ठता तुममे, हर श्रेष्ठता में तुम्हे ही क्यों ना देखूं ?
अयमात्मा ब्रह्म ( यह आत्मा ही ब्रह्म है)
सागर भी जल है, बूँद भी तो जल ही है | हर किरण में सूर्य का गुण है | आत्मा चाहे जितना छोटा अंश हो, उसमे ब्रह्म से जुड़ने की क्षमता है ओर उससे जुड़ने के बाद छोटा बड़ा क्या ? जल की टोंटी ओर विशाल टंकी दोनों में पानी देने की समान क्षमता है, तो दीन क्यों बनूँ, समर्थ बनकर क्यों ना रहूँ ?
आभार – शान्तिकुंज हरिद्वार ( www.awgp.org )
