वेदना कहीं तो प्रतिबिम्बित करती है मुझे,
और उसी प्रतिबिम्ब के अधःतल में,
कहीं दिखता है सारा संसार ।
मां के गर्भ से निकलता शिशु,
भूख के मारे सड़क पर बिलखता बच्चा,
पैसे कमाने के लिये परदेस जाता बेटा,
शादी के बाद पराये घर जाती बेटी,
दहेज के अभाव में ससुराल में दम तोड़ती बहू,
पति के युद्ध में मारे जाने पर आँसू बहाती विधवा,
बेटे द्वारा त्यागे जाने पर दर-दर भटकते माता- पिता ,
और आतंक के डर से घर छोड़ता परिवार,
सबके अंतः में वेदना ही तो है |
या फिर सांकेतिक अर्थों में,
बढ़ती आबादी के कारण बिगड़ता प्रकृति-संतुलन,
जानलेवा नशे के चंगुल में फँसती युवा पीढ़ी ,
आरक्षण के आग में झुलसते संस्थान ,
बम – धमाकों से दहलता शहर ,
मँहगाई से चरमराती अर्थव्यवस्था ,
सम्प्रदाय की चपेट में झुलसते लोग,
भ्रष्टाचार की आग में झुलसता राष्ट्र ,
शौक – स्वाद के कारण विलुप्त होते जीव ,
प्रभुत्व के लिये आपस में झगड़ते देश ,
और इन सबके समाधान में अक्षम प्रतीत होता विज्ञान ,
सबके अंतः में वेदना ही तो है |