लापरवाही एक प्रकार का अपराध है, यह एक प्रकार की आत्महत्या ही है। अपने-आपको, अपने धन या शरीर को आलस्य के तेजाब में गला देना लगभग वैसा ही है, जैसा कोई मंद विष खाकर अपनी अंतड़ियों को गला देता है । दूसरों के प्रति धोखा, आक्रमण, हिंसा, दुर्व्यवहार, द्वेष आदि अनेक प्रकार के अपराध लोग करते हैं । अपने आप के प्रति वैसा ही अपराध लापरवाही और आलस है । इससे अपना जीवन नष्ट हो जाता है । भविष्य की सभी उज्जवल संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं और वह दिन तेजी से निकट खिंचता चला जाता है, जिसे दुर्भाग्य और पतन का दिन कहकर पश्चाताप किया जाता है ।
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जो बात अनुचित है, उसे हृदय में अनुचित ही मानिये । आप इसका त्याग नहीं कर पा रहे हैं, यह दूसरी बात है ।चूँकि हम बीमार हैं, इसलिए बीमारी अच्छी चीज है, यह मानना य खुद समझना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है। मनुष्य भूलों, कमजोरियों और बीमारियों से मुक्त नहीं है, आप भी उनसे मुक्त नहीं हैं ।हमें अपनी कमजोरियों को समझना चाहिए और उनके विरुद्ध विद्रोह जारी रखना चाहिए, चाहे वह विद्रोह कितना भी मन्द क्यों न हो । जो बुराई है, उसे बुराई ही समझना चाहिए और उसके विरुद्ध लड़ाई जारी रखनी चहिए ।
- वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
