कोशिश जीवन-पथ पर चलने की
और ये सूजन मेरे ‘पैरों’ में,
आ जाओ पीड़ा बस जाओ
है आँखें खुली अब सहरों में |
लम्हे अब कैसे छीनोगे
हर सांस को अब मैं जीता हूँ,
तुम कहते थे न मैं संगदिल हूँ
देखो मैं तन्हाई से रीता हूँ |
मैं पड़ा सुनता ही रहता हूँ,
इस ख़ामोशी का चिल्लाना
है जुगत बड़ी इन लंगड़े-बहरों में,
ये सूजन मेरे ‘पैरों’ में | 
कल आँखें पूछ रही थी मुझसे
क्या तुम्हे वो चेहरा याद है ?
मैं क्या कहता, उत्तर देता
अंधों की भी कोई फ़रियाद है ?
पर रुक न सका उसका बहना
कोई तो दौड़ो, उसे पकड़ो
कुछ यादें बही है इन लहरों में,
ये सूजन मेरे ‘पैरों’ में |
फिर यूँ ही बिस्तर पे पड़े-पड़े
इक रोज ये उलझा अपना मन
हैं शीत, ग्रीष्म और पतझड़ भी
क्यों मैंने याद रखा बस सावन ?
खैर! पूछा उसने मुझसे, उस सावन में
कहो कितनी बांटी खुशियाँ या बंटाया ग़म
और मैं मूक खड़ा था कटहरों में,
ये सूजन मेरे ‘पैरों’ में |
तन्हाई ने दोस्त दिए कितने
बस ये पेट बड़ा पापी ठहरा,
कहता न मैं कुछ समझता हूँ
तू भले हो मूक, लंगड़ा, अँधा, बहरा
रोज ठीक समय पर उसकी जिद
कुछ पड़े-२ मिल जाने की ख्वाहिश
माँ याद तू बड़ी आती है दुपहरों में,
ये सूजन मेरे ‘पैरों’ में |
~ राजेश ‘आर्य’





