Posted by: राजेश रंजन | March 11, 2008

वो खोमचे वाला

आज तीसवाँ दिन है,
जब मैं लौट रहा हूँ
औफ़िस से
और मेरी निगाहें लगातार ढूँढ रही हैं,
उस खोमचे वाले को,
जो रोजाना लगाया करता था-गोलगप्पे,
अपने उस छोटे से ठेले पर,
और मेरे कदम अचानक मुड जाते थे उस और,
पापा के सभी सलाहों को नजर-अंदाज़ कर ।

तो क्या सचमुच चला गया वो,
हमेशा के लिये इस शहर को छोड़कर ?
वो शहर जिसे अभिमान है,
अपने अमीरीपन पे |

वो शहर जिसे पसंद नहीं,
किसी गरीब, लाचार को पनाह देना ।
कल तक वो शहर मजबूर था,
अपने संरक्षक राष्ट्र के नाम पर,

लेकिन अब क्यों??

अब वो बड़ा हो गया है,
अब उसकी अपनी जरुरतें हैं,
जो मेल नहीं खाती राष्ट्र की जरुरतों से ।

दोष किसका है,
मालूम नहीं,
मालूम है तो बस कि,
वो खोमचे वाला भुगत रहा है,
किसी अनजान पाप कि सज़ा ।
अनजान पाप-
शायद भारतीय होने का पाप ।
पाप ही तो है उसके लिये,
भारतीय होना इतना आसान भी नहीं ।
उसे जाननी होती है कई सारी भाषाएँ,
उसे रुबरू होना होता है,
कई धर्म, कई वेश-भूषा, कई रूपों से ।
और फ़िर उसे जीना होता है इस दंभ के साथ,
कि हम सब एक हैं,
हमारी संस्कृति एक है,
हमारा देश एक है।
और फ़िर एक दिन अचानक,
उसकी थोड़ी-सी उदासीनता,
अल्प-ज्ञान अथवा अल्प-जागरुकता,
चूर-चूर कर देती है उसका यह दंभ,
जो उसने बड़ी मुश्किल से प्रतिस्थापित किया था,
अपने तमाम विरोधी विचारों से लड़-झगड़ कर |

खैर, अब तो जिह्वा भी भूलने लगी है,
इस गोलगप्पे का स्वाद |
और मैं जल्द ही सीखने लगा हूँ,
अपने स्वाद  को भूलकर,
सिर्फ़ खाने के लिये खाना ।
जैसे उस खोमचे वाले ने भी सीख लिया होगा,
सपरिवार,
अपनी भूख को भूलकर,
सिर्फ़ जीने के लिये जीना ।

Older Posts »

Categories