मैं और मेरा एकाकीपन,
सोच रहे हैं, कुछ मिलकर शायद
और मेरी अँगुलियाँ अनायास ही,
मेरी इन्द्रियों से मुक्त होकर,
कुछ उकेर रही हैं कागज पर ।
कुछ आकृति सी उभर रही है-
मानव सदृश ।
अरे ये तो मैं हूँ !
मैं कुछ मुस्कुराता हूँ,
अपनी तस्वीर को देखकर,
फ़िर अगले ही पल,
एक अजीब सी शिकन ।
ये क्या,
कभी उभरने की उमंग,
कभी सिमटने की घुटन ।
एक ही प्रवृति पर दोहरे एहसास क्यों ?
पता नहीं,
ये रेखाएँ मुझे बना रही हैं,
या मैं इन रेखाओं को ?
मैं एकाकीपन खोजता हूँ,
या एकाकीपन मुझे खोज लेती है ?
फ़िर अनायास ही कभी उभर आता हूँ मैं,
अपने-आप को सिमटता देखकर ।
व्याकुलता-
अपने-आप से भागने की,
फ़िर अगले ही पल व्यग्रता-
अपने-आप को पाने की,
शायद कोशिश,
अकेले जीने की,
अकेलेपन से भागकर ।
————”सर्जना” – २६ वें अंक में प्रकाशित————-